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Monday, September 5, 2011

परिधियाँ (From old diary-2)

ये परिधियाँ
इस तरह घेरे हैं मुझे
कि
मैं इस सीमित वृत में
सिमटा हुआ हूँ
सिकुड़ा हुआ हूँ
और
बाहर आना चाहता हूँ
इन गोलाइयों से
इन्हें खींचने कि कोशिश में
घायल सा हुआ
लांघना चाहता हूँ
वृत कि सीमाओं को
थक जाता हूँ
और
दबाव हटते ही
ये परिधियाँ
रबड़ कि तरह
फिर समेत लेती हैं
मुझे
उसी दायरे में

Tranlation

Trapped in the circle
I want to break free
Bound in limits
Feeling contraction
want to go out of the circle
Trying hard
Wounded
Tired
As soon as about to cross
Can't withstand
The pressure
The circumference
Like a rubber
Traps me again
In the same circle

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