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Tuesday, August 30, 2011

I AM NEVER ISOLATE.....(from my old diary...part 1)


I am never ISOLATE

I know my destination, thou' do not know the way
Let me move on, am not going to stay

Here I go, I am not alone
The whole nature accompanies, me all along

I can hear, the call of river
Dancing before me, allays my fear

Chirping birds,singing songs
Empower my feet,make me strong

Winds scratch past, whispering in my ears
Time is less, move fast o'dear

Clouds smile, giving me salute
Shower their blessings, what a tribute!

Fragrance of flowers, keeps rejuvenate
Filled with gratitude, bow to all my mates

Who says I am alone, I am never Isolate
I am never isolate, Iam never Isolate

(This piece of poetry is from my old diary, written when I was sixteen years old)

Thursday, August 18, 2011

परमानन्द .....

न जाने कौन से सुर हैं वो
जो छू जाते हैं अंतर्मन को
कभी सहलाते हैं
और
कभी घाव कर जाते हैं
शायद
अधूरे सपनों से
छेड़ छाड़ कर जाते हैं

और ये तुम्हारे साज़
पहना देते हैं सुरों को ताज
न जाने कहाँ से
गूँज उठती है अनोखी ताल
अनायास ही थिरक उठते हैं मेरे पाँव

सुर साज़ और ताल का
ऐसा अनोखा मिलन
सारी सृष्टि
आनंद विभोर हो उठी है
प्रत्येक कलाकृति
जीवंत हो गयी सारा
सारा ब्रह्माण्ड नृत्य में मग्न है

प्रेममयी अश्रु धारा में
मेरे होने का अर्थ ही धुल गया है
सब एक हो गया है
सब शांत हो गया है
सब मौन हो गया है
शेष है
एहसास
परमानन्द का

Tuesday, August 16, 2011

ETERNAL....

Disturbance in my soul
creates
ripple in the ocean

With a little bit of
sound
many a waves engender

That move through some
distance
eventually disappear

No wave seen after a while nor
tears
as if nothing happened ever

Born out of
nothing
dissolved into nothing

What remained for ever
is
ETERNAL

Tuesday, August 2, 2011

मुझे मालूम न था....

मेरी ही हसरतों ने मुझको मारा, मुझे मालूम न था!
ताउम्र गैरत को कोसता रहा;
और खुद से ही रहा गैर,
मुझे मालूम न था!

मेरी चाहतों ने ही मुझको अजगर की तरह भींचा;
खुद के खून से ही मैंने अपने दुखों को सींचा !
जो उगे उस पर फूल मेरी मौत के,
मुझे मालूम न था !

जिस जिस को कहा था ख्वाबों मैं मैंने अपना !
मेरे रिश्तों का बोझ उम्र भर घुट घुट कर वो ढोते रहे !
ऊपर से हँसते रहे हमेशा और अंदर से रोते रहे,
मुझे मालूम न था !

करना माफ़ ओ तमां जहान मुझको
तुम्हारी नफरत को मैंने ही सींचा,तुम तो रहनुमा मेरे थे !
गम के दानों को मैंने ही चुगा, तुमने तो मोती बिखेरे थे,
खुद ही खुद को ठगा, ये मुझको मालूम न था !

शुक्रगुज़ार हूँ उस खुदा का,जगाया जिसने है मुझको;
हटा के आँखों का पर्दा, दिखाया सच है मुझको !
मेरा रहनुमा मेरे इतनी नज़दीक था,
मुझे मालूम न था !