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Tuesday, September 28, 2010

मैं और मेरा अकेलापन

福安小漁港

मैं और मेरा अकेलापन
गहरे दोस्त हैं
जब भी थक हार जाता हूँ
संसार के कर्म काण्ड से
दिखावटीपने से
तो ये मुझे
गले से लगा लेता है
मेरे सब दुःख हर लेता है
मुझे मेरे होने का एहसास कराता है
उतार कर रख देता है
मेरा मुखौटा
मुझे मेरी ही गर्त की
गहराइयों में ले जाता है
जहां कोई नहीं होता
हम दोनों के सिवा
जहां एहसास होता है मुझे
मेरे खोखलेपन का
एहसास होता है
जीवन के मिथ्यापने का
न हर्ष न शोक
न रिश्ता न नाता
न जीवन का एहसास
न मौत का गम
न कुछ खोना
न कुछ पाना
आनंद ही आनंद
आनंद ही आनंद
बस
मैं और मेरा अकेलापन











3 comments:

  1. i think that is the truth of life. The sooner we realise it in our life, happier we are for the rest of our life. Expecting anything from anyone else, even our children or spouse, only calls for a disillusionment sooner or later... resulting in grief and discontent of an intensity directly proprtional to the portion of our life we spent actually believing we r not alone.

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