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Sunday, August 1, 2010

चुप हो गयी है मेरी कविता

क्यों चुप हो गयी है मेरी कविता
ये एहसास हो रहा है
सब अर्थहीन है
और
मैं भी अंश हूँ
उस अर्थहीन का
तो कविता  भी
निरर्थक होती जा रही है
मेरी कविता
चुप होती जा रही है


आयु:पर्यन्त
बहुत कुछ चाहा
कुछ मिला
कुछ नहीं मिला
जो नहीं मिला
निरर्थक था
पर जो मिला
वो भी निरर्थक होता जा रहा है
अत: चुप होती जा रही है मेरी कविता

समय  यूँ फिसल रहा है
मानो मुट्ठी से रेत
फिर भी कुछ कण चिपके हैं
हाथों में चिपचिपाहट अभी बाकि है
ज्यों ज्यों साफ़ हो रहें हैं
वो कण भी छुटते जा रहें हैं
तो चुप होती जा रही है मेरी कविता
चुप होती जा रही है मेरी कविता
ॐ में लीन होती जा रही है मेरी कविता

3 comments:

  1. यह कविता तो बहुत अछी है!
    One of your best, i must say
    I love reading your poems and blogs, so please keep writing

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  2. Great great great GREAT poem!! Every paragraph says so much!! every example is beautiful..

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  3. Waoow Mumma.... such a nice one!! Unbelievably good! Please don't ever stop writing again..!
    :)

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