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Thursday, July 22, 2010

अंतहीन

कौन हूँ मैं 
कंहा जाना है मुझे
क्या खोया है
क्या पाना है
ये दर्द का सैलाब
क्यों है मेरे भीतर
किसे पुकारता हूँ
मैं हर पल
कौन है मेरा
क्या चाहिए मुझे उससे
किसकी याद करती है मुझे
बेचैन
किसकी याद मैं हूँ मैं
दिन रैन
इन्ही प्रश्नों का बोझ लेकर
चलता ही जा रहा हूँ
थक गया हूँ उत्तर नहीं मिल रहा
पर पूछता ही जा रहा हूँ
किससे पूछ रहा हूँ
क्यों पूछ रहा हूँ
क्या कभी अंत होगा इन प्रश्नों का
कब होगा
कैसे होगा
क्या हल है भी इन प्रश्नों का
कभी मिला है किसी को
हल इनका
शायद
तभी होगा इनका अंत
जब मिल जाऊँगा उस अंतहीन मैं
हो जाऊँगा बेअंत
न हस्ती रहेगी
न बस्ती रहेगी
न मैं ही रहूँगा
न प्रश्न रहेंगे
न कहने वाला रहेगा
न कहावत रहेगी न सुनने वाला रहेगा 
वो एक ही रहेगा
बस एक ही रहेगा

3 comments:

  1. hiii madan aunty.. very nicely written.. n the last 2 lines r THE best :)

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  2. Hello,

    Its very good and true what you have written.... we just need to realise that questioning the mere existence will just complicate things, so its better to just face whatever good or bad comes ur way and enjoy what you already have.

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  3. this is exactly what goes on in my confused head so many times.. but look how clearly and simply you have put it down...!
    Amazingly good
    :)

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