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Wednesday, May 2, 2012

"आया है अकेला, जायेगा अकेला"



पर्दा ही ठीक है
गुज़र जाने दो अनजाने में 
गहरी नींद में सपने की तरह 
 असमर्थ हूँ सामना करने में 
उस  भयावह सच का 

जानता हूँ उस  सच को 
पर रहने दो उसे 
अहम्  की परतों तले 
झूठी ही सही,हंसी 
हंस  तो लेता हूँ 
झूठा ही सही सहारा 
बेफिक्र  तो हूँ 

क्यूँ आ  जाते हो फिर 2
उधेढ़ने परत 2
कर के आत्मा के तार 2
उस  भयावह सच को 
उजागर कर देते हो बार 2

जानता हूँ, 
ऑंखें बंद करने से कुछ  न  होगा 
और भी भयावह हो जायेगा 
बंद आँखों में वह दृश्य 
और भी पारदर्शी हो जायेगा 
जब देखेगा इसे अंतर्मन 

क्या थाम  लोगे मुझे 
जब वो परतें हटेंगी 
वो आधार  हिलेगा 
जो था ही नहीं 
वो सपना टूटेगा 
अस्तित्व  जिसका 
था ही नहीं 

सच  सामने होगा 
उस  प्रलय  की रात 
आओगे? थामोगे मेरा हाथ ?
जीवनभर जैसे दिया साथ 
चलोगे संग  मेरे कालान्त?

नहीं 
अतः 
हट जाने दो पर्दा 
हो जाने दो रौशनी 
हटने दो अन्धकार 
उठने दो स्वयं से 
अपनी ही धरती का आधार 
हो जाने दो अभी 
इस  सच  से अभिभूत 
"आया है अकेला "
"जायेगा अकेला"
ॐ 


Friday, November 25, 2011

GRATITUDE....

I will not beg you
Though
I know
You are
OMNIPOTENT
As
I know
You are also
OMNISCIENT
And know
What is apt for me
Before I know
And do the needful
Before I pray for

Indeed
I am
Grateful to you
For
Whatever bestowed
Without asking !
Without earning!!
Without deserving!!!
OM...

Saturday, October 1, 2011

SILENCE......

In my silent self
Not letting in anyone
Not even myself
Everything appears perfectly right
Acceptance is the only choice
No desire,no fright
Darkness does not exist at all
Days and nights appear equally bright
Time ceases to be
Just witnessing
Ephemeral breath
Total calmness
In the sea of tranquility
No waiting
Even for death
Immersed in
Total
SILENCE

Wednesday, January 19, 2011

अंतर्मन की खोज

मन की संवेदनाएं
कभी आनंद से अभिभूत होती हैं
तो कभी दर्द से आहत
कभी करती हैं प्रेरित
कुछ लिखने को
कभी खोजती हैं
लकीरों में आकार
तो कभी सुरों में बंधना चाहती हैं

पर इनको
न शब्द मिल पा रहे हैं
न आकार, न ही लय
तरंगों की भांति
भीतर से उठ कर
हो जाती हैं विलय
भीतर ही कहीं

न कविता बन पाती है
न ही हो पाता है चित्रण
इन संवेदनाओं का
और न ही होता है उद्गम
किसी गीत का

घुट सा रहा है ये मन
शायद खोज रहा है
अपना अस्तित्व
ढूंढ रहा है शब्दों की बैसाखियाँ
स्वंयं होना चाहता है परिभाषित
पकड़ता है कभी रेखाओं का दामन
कभी खोजता है सुरों की सरगम

पर शायद भूल गया है
अपने ही
अंतर्मन की पहचान
जिसे इन संवेदनाओं को
समझने के लिए
न शब्द चाहिए
न सुरों का साज
न ही हैं ये
रेखाओं की मोहताज़
न कोई अपेक्षा
न शिकायत
प्रशंसा और निंदा के घेरे से मुक्त
केवल सच से ओत प्रोत
करती है उसकी हर प्रेरणा
मार्गदर्शन
हर पल
हर क्षण
ॐ