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Saturday, October 1, 2011

SILENCE......

In my silent self
Not letting in anyone
Not even myself
Everything appears perfectly right
Acceptance is the only choice
No desire,no fright
Darkness does not exist at all
Days and nights appear equally bright
Time ceases to be
Just witnessing
Ephemeral breath
Total calmness
In the sea of tranquility
No waiting
Even for death
Immersed in
Total
SILENCE

Tuesday, September 28, 2010

मैं और मेरा अकेलापन

福安小漁港

मैं और मेरा अकेलापन
गहरे दोस्त हैं
जब भी थक हार जाता हूँ
संसार के कर्म काण्ड से
दिखावटीपने से
तो ये मुझे
गले से लगा लेता है
मेरे सब दुःख हर लेता है
मुझे मेरे होने का एहसास कराता है
उतार कर रख देता है
मेरा मुखौटा
मुझे मेरी ही गर्त की
गहराइयों में ले जाता है
जहां कोई नहीं होता
हम दोनों के सिवा
जहां एहसास होता है मुझे
मेरे खोखलेपन का
एहसास होता है
जीवन के मिथ्यापने का
न हर्ष न शोक
न रिश्ता न नाता
न जीवन का एहसास
न मौत का गम
न कुछ खोना
न कुछ पाना
आनंद ही आनंद
आनंद ही आनंद
बस
मैं और मेरा अकेलापन











Friday, September 24, 2010

The Other Is Hell.......t

The Moon was but a Chin of Gold
Let me not think about others
The other is hell
Come out of I.My,Me
Feel all is well

No bondage
Make your soul free
Be one with Him
And inside you see
You are content
You are perpetual
Too be happy and sad
Is Body's ritual

Saturday, August 28, 2010

मैं क्या हूँ ,क्या दिखता हूँ!!!

मैं क्या हूँ ,क्या दिखता हूँ!
देखो तो बाहर से मैं कितना सुंदर सा दिखता हूँ!
                       मैं कितना सुंदर दिखता हूँ!!
इक ज्वाला सी मन मैं धधक रही;
विरह के भय में सुलग रही;
अंगारों के ऊपर भी मैं कितना शीतल सा दिखता हूँ!
                          मैं कितना शीतल दिखता हूँ!!
क्यों मान नहीं मैं कलप रहा;
अंजान खड़ा सा  सिसक रहा;
इक अजनबी मुस्कान लिए ,कितना अपना सा दिखता हूँ!
                                      सबको अपना सा दिखता हूँ!!
दिव्य स्वप्न सा जाता जीवन दिख रहा
ये करना था ये नहीं किया ,वो करना था वो नहीं किया;
इन विक्षेपों की धाराओं पर,मैं कितना शांत सा दिखता हूँ!
                                   मैं कितना शांत सा दिखता हूँ!!
ऐसा होता तो अच्छा था,वैसा होता तो अच्छा था;
यह क्यों हुआ,वह क्यों न हुआ;
इस शोर से आहत हूँ भीतर ,पर बाहर मैं मौन सा दिखता हूँ!
                                       मैं कितना मौन सा दिखता हूँ!!
दुनिया से जाने से पहले ,मैं कुछ बन कर दिखलाऊँगा ;
याद करें पीछे सब मुझको ,ऐसा कुछ करके जाऊँगा
ऊंचे संकल्पों के पर्वत पर खड़ा ,नीचा धरती पर दिखता हूँ!
                                  मैं कितना झुकता सा दिखता हूँ!!
तुम भी मेरे, वो सब मेरे;
यह भी मेरा, वह भी मेरा;
इन संबंधों की जकड़न में,मैं कितना मुक्त सा दिखता हूँ!
                                  मैं कितना मुक्त सा दिखता हूँ!!

Monday, August 16, 2010

OM......

Nothing is as vast
                                    As the NOTHINGNESS
you and I
The whole sky
Visible and invisible world
Is the manifestation
Of
                                      That NOTHINGNESS
Everything
Floating over it
Being soluble in it
Gradually
Sublime
And
Dissolve
                                    In that NOTHINGNESS
But
I
Wonder
Is it
NOTHINGNESS
Or
EVERYTHING
Or
Is it that
OMNIPOTENT!
OMNISCIENT!!
OMNIPRESENT!!!
OM....
OM........
OM.............
........................
............................
................................

Sunday, August 1, 2010

चुप हो गयी है मेरी कविता

क्यों चुप हो गयी है मेरी कविता
ये एहसास हो रहा है
सब अर्थहीन है
और
मैं भी अंश हूँ
उस अर्थहीन का
तो कविता  भी
निरर्थक होती जा रही है
मेरी कविता
चुप होती जा रही है


आयु:पर्यन्त
बहुत कुछ चाहा
कुछ मिला
कुछ नहीं मिला
जो नहीं मिला
निरर्थक था
पर जो मिला
वो भी निरर्थक होता जा रहा है
अत: चुप होती जा रही है मेरी कविता

समय  यूँ फिसल रहा है
मानो मुट्ठी से रेत
फिर भी कुछ कण चिपके हैं
हाथों में चिपचिपाहट अभी बाकि है
ज्यों ज्यों साफ़ हो रहें हैं
वो कण भी छुटते जा रहें हैं
तो चुप होती जा रही है मेरी कविता
चुप होती जा रही है मेरी कविता
ॐ में लीन होती जा रही है मेरी कविता

Thursday, July 29, 2010

Let it be.......

Danube river near Futog
Who is sad
I know not
Something is melting
Let it be....

Who is helpless
I know not
Something is evaporating
let it be....

Who is moving
I know not
Something is flowing
Let it be....

Who am I
I know not
Something is vanishing
Let it be....

And what remains is purest form of life........

That never wants
Never cries
That never moves
Never dies

Abounds in truth
Enlightened soul
Full of life
Full of love.......


                 
Enhanced by Zemanta

Thursday, July 22, 2010

अंतहीन

कौन हूँ मैं 
कंहा जाना है मुझे
क्या खोया है
क्या पाना है
ये दर्द का सैलाब
क्यों है मेरे भीतर
किसे पुकारता हूँ
मैं हर पल
कौन है मेरा
क्या चाहिए मुझे उससे
किसकी याद करती है मुझे
बेचैन
किसकी याद मैं हूँ मैं
दिन रैन
इन्ही प्रश्नों का बोझ लेकर
चलता ही जा रहा हूँ
थक गया हूँ उत्तर नहीं मिल रहा
पर पूछता ही जा रहा हूँ
किससे पूछ रहा हूँ
क्यों पूछ रहा हूँ
क्या कभी अंत होगा इन प्रश्नों का
कब होगा
कैसे होगा
क्या हल है भी इन प्रश्नों का
कभी मिला है किसी को
हल इनका
शायद
तभी होगा इनका अंत
जब मिल जाऊँगा उस अंतहीन मैं
हो जाऊँगा बेअंत
न हस्ती रहेगी
न बस्ती रहेगी
न मैं ही रहूँगा
न प्रश्न रहेंगे
न कहने वाला रहेगा
न कहावत रहेगी न सुनने वाला रहेगा 
वो एक ही रहेगा
बस एक ही रहेगा

Tuesday, July 20, 2010

I need you

I don't know if
you are there
or not,
but I need you
to have
the power
to enlighten my soul
and to be
desire-less
and desire for you.

Whether you are there or not
is meaningless for me
because what I desire
you can give me
even by not being
I desire
to not desire for anything.

But still
I need you.
I need you.